Pages

Tuesday, March 1, 2011

एक नज़्म

नज़्म अपनी हम ये उनके नाम करते हैं,
याद में जिनकी हम करवट बदलते हैं.
ख्याल आता है उनकी हर-इक बात का हमको,
ये लब भी उनको हर पल तस्लीम करते हैं.
फ़ुरसत से बनाया है उनको खुदा ने,
हम उस खुदा को तहे दिल से सलाम करते हैं.
वक़्त दिन का हो या रात का यारो,
ख़्वाब में हर पल उनका दीदार करते हैं.
रुक-रुक के उनका हँसना, रह-रह के खिलखिलाना.
कर दे दीवाना हमको, उनकी वो हर शरारत.
जब-जब वो याद आये, ये होंठ गुनगुनाएं,
दिल मेरा मुस्कराए और गुदगुदी मचाये.
हर जानते हैं यारो, ये नज़्म क्या कहेगी,
मासूमियत पे जिनकी कुरबान ये खुदाई.
जब-जब वो याद आये, ये होंठ गुनगुनाएं,
दिल मेरा मुस्कराए और गुदगुदी मचाये.