तेरा थक कर कांधे पे सिर रखना
और फिर अगले ही पल सो जाना
रूह
को इत्मिनान देता है।
ये दिल अपनी रफ़्तार बदल देता है
और धीमे से तेरा नाम गुनगुनाता है।
नज़रें तेरे चेहरे से हटने का मन नही करतीं
लेकिन उनको हटा ही लेता हूँ ये सोचकर
कि कहीं
ये तुमको उठा न दें।
तेरा हाथ थाम कर तमाम उम्र गुज़ारने को दिल करता
है
तेरे साथ चिलचिलाती धूप भी बसंत की बहार लगती
है।
सफ़र मीलों का हो या चाँद क़दमों का
दिल करता है कि काश ख़त्म ही न हो।
बस चंद लफ़्ज़ हैं इस जहन में मेरे
पर डरता हूँ वो काफी नही तेरे अदब के लिए।
ख़ैर अल्फ़ाज़ों की मंदी तो बनी ही रहेगी
कभी कांधे पे सिर रखना तो सुनना इस दिल की भनक,
शायद ये वो कुछ कह पाये
जिनको लफ़्ज़ों में हम पिरो नहीं पाते।