बाबासाहेब छह दशक हो गये जब से आप हमको छोड़ गये हैं,
इस दरमयान हमने बहुत कुछ खोया भी है, और कुछ पाया भी.
जो खोया उसका लेखाजोखा आप भी रख रहे होंगे कहीं दूर,
लेकिन जो पाया है हमको पता है वो काफी नहीं है.
सच कहूँ तो कुछ भी नहीं है उसके बराबर जो आपने सोचा होगा.
लेकिन जो चिंगारी आपने जलाई थी वो अभी भी सुलघ रही है,
कहीं बस राख में जिंदा है, तो कहीं सुलघने की कगार पर.
कुछ अफसर भी बने हैं हम में, कुछ अभी भी वहीँ है जहाँ आप छोड़ गये थे,
कुछ आत्मसम्मान के लिए मरने मारने पर उतारू होने लगे हैं,
कुछ अभी भी गरीबी और लाचारी की बेड़ियों में जकड़े हैं,
आप ना होते तो ये दरिन्दे शायद कभी हमको इंसान ना मानते,
ना मानते कि हमारा भी हक है इस देश के संसाधनों में.
आपकी याद तो हर रोज़ आती है हमको,
ये याद कभी ख़ुशी का कारण होती है तो कभी दुःख का,
ख़ुशी इस बात की होती है कि आपके चलते आज हम हैं,
दुःख इसका है कि ज्यादातर अभी भी दूसरों के टुकड़ों पर पल रहे हैं.
वैसे आपने जिस बिल के लिए इस्तीफा दे दिया था,
वो आज तक इन लोगों ने नहीं आने दिया,
छुटमुत छूं छाँ करते रहते हैं लेकिन नियत नहीं बदली है इनकी.
मज़े की बात ये है कि ये इतने डर गये हैं आपसे कि,
कुछ दिनों पहले सर्वे में दूसरे सबसे महान का वोट कराये,
क्यूँ कि पहले का कराते तो गांधी गुलटायीं खा जाते,
ये बावले हक्के बक्के हुए जा रहे हैं आज कल,
पैसे के लिए आपकी लेखनी पर खुदका नाम चेप देते हैं,
हम में भी कई विभीषण हो गये हैं, कुछ बामन,
आपके नाम की आढ़ में बुद्धजीवी बनने की दौड़ में हैं,
लेकिन इनकी सोच अभी भी बद्बू मारती है.
जब किसी बेघर को देखता हूँ तो याद आ जाती है वो रात,
जब आपको एक छत के लिए भटकना पड़ा था इस महान देश में.
आपने एक गांधी देखा होगा, आज यहाँ अनगिनत गाँधी हैं,
हर घर में एक गाँधी, जो बड़ी बड़ी बातें करता है लेकिन करता कुछ नहीं.
ये गाँधी की तरह ही बोलते हैं कि ये जातिवादी नहीं है,
लेकिन बेटे बेटियों को दूसरे जाति में शादी करने पर मार देते हैं.
देखा जाये तो बहुत कुछ बदल गया है, और कुछ भी नहीं बदला,
लेकिन जैसा आपने बोला था ठीक वैसा ही करते हैं ये लोग,
इसलिए कभी ऐसा नहीं लगता कि अरे ऐसा कैसे हो गया.
मंदिर में प्रवेश की नौटंकी अब भी जारी है,
मुझे पता है आप खिन्न होंगे ये सुन कर लेकिन माजरा यही है.
चलिए बहुत हुयी दुःख भरी बातें कुछ खुश खबरी भी सुनिए,
आपकी बेटियाँ अब अपने हक और अधिकार के लिए निकल पड़ी हैं,
पिछले साल से दलित-स्त्री स्वाभिमान यात्रा जारी है पूरे देश में.
इतिहास को भी पढना और समझना आ रहा है हमको,
इस टेढ़े समाज का ढांचा भी खूब समझने लगे हैं हम.
आपके कुछ बच्चे और बच्चियां निडर होकर लड़ रहे हैं
अपने करोड़ों परिवारों के लिए जो बेजुबान हैं,
आपका लिखा संविधान हमारी ताकत बन गया है,
मनु स्मृति का दहन हर साल करते हम चूकते नहीं हैं अब.
भूत भुतडियों को हमने पूजा की अलमारी से फेंक दिया है,
दकियानूसी में भी पड़ना भूल रहे हैं हम.
आपने कहा था कि अगर कारवां आगे ना ले जा सको तो यहीं छोड़ देना,
हम इसको आगे ले जाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं,
कभी कभी टूट भी जाते हैं लेकिन हमारा संघर्ष प्रेरणा देता है,
और हम फिर से उठ कर आगे चल पढ़ते हैं.
सफ़र तो लम्बा है, लेकिन कारवां चल रहा है आपका,
जल्दी ही आपको फिर से ख़त लिखूंगा,
ख़त में फिर से कुछ दुःख की कुछ ख़ुशी की बातें होंगी,
आप यूँ ही बस हमारे साथ बने रहिये,
प्रकाश देते रहिये, हम चलते रहेंगे धीमे धीमे.
शुक्रिया बाबासाहेब.
~आपका अपना नाती