मैं जब रात में कभी
किराये के कमरे की छत पर जाता हूँ
तो पास की बिल्डिंग के एक कमरे में
पंद्रह बीस आदमी सिलाई मशीन चलाते
कपडे बुनते नज़र आते हैं.
जब दुनिया नींद में अपने सपने बुनती है
तब ये लोग कपड़े बुनकर सपने बुनते हैं.
फिर सोचने लगता हूँ इनके घर वाले भी
घर पर शायद सपने बन रहे होंगे
कुछ मीठे सपने
बेटी को स्कूल भेजने के सपने
घर में फ्रिज लाने के सपने,
बेटे की पप्पी लाने की जिद मानने के सपने
और भी न जाने क्या क्या.
हम सब सपने बुनते हैं
कभी सड़क पर चलते हुए
कभी किसी खास से मिलकर.
सपने बुनना जिंदा रहने की निशानी है,
ये एक मानवीय कला भी है शायद.
आज सिलाई मशीन देखकर याद आया
मैंने बहुत दिनों से सपने नहीं बुने हैं
आज मैं भी कुछ एक सपने बुनूँगा
और उनको सरहाने रखकर सो जाऊंगा.
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