जहाँ भी जाता हूँ फिज़ा में महक तेरी रहती है,
भीड़-ओ-तन्हाई में तेरी सूरत सामने रहती है|
वक़्त दिन का हो या आधी रात का ये दोस्त,
तुझसे गुफ्तुगू की चाहत हर वक़्त रहती है|
भले हो दरमियाँ मीलों का तुझसे,
तेरे दीदार की आश बनी रहती है|
दिल-ओ-जिगर दीवाने हैं मेरे तेरे,
बस तुझे अपना बनाने की कोशिश रहती है|
भर दूँ झोली तमाम खुशियों से तेरी,
हसरत ये ज़िन्दगी की रहती है |
जहाँ भी जाता हूँ फिज़ा में महक तेरी रहती है,
भीड़-ओ-तन्हाई में तेरी सूरत सामने रहती है|