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Friday, November 28, 2014

A still from "The Fault in Our Stars"

Hazel: What are you thinking about?

Augustus: Oblivion(state of being forgotten). I know it's kid stuff or whatever.. but I always thought I would be a hero. I thought I would have a grand story to tell. You know, something they publish in all the papers, and I mean, I was supposed to be special.

Hazel: You are special Augustus.

Augustus: Yeah I know but..you know what I mean.

Hazel: I do know what you mean, I just don't agree with you.

After a pause...
Hazel: You know this obsession you have with being remembered?

Augustus: Don't get mad,

Hazel: I am mad! I am mad because I think you are special. And is that not enough? You think that the only way to lead a meaningful life is for everyone to remember you, for everyone to love you. Guess what, Gus(Augustus). This is your life, okay? This is all you get...You get me, and you get your family and you get this world, and that's it. And if that is not enough for you, then I am sorry it is not nothing.
Because I love you. And I am gonna remember you.

Augustus: I am sorry, you are right.

Hazel: I wish you would be happy with that.

Augustus: it is good life Hazel Grace.


Hazel: It is not over yet. :)

दस का किस्सा

रित और अनामिका रिक्शे से उतरने के बाद एक दूसरे को देखने लगे और पल भर के लिए किसी दूसरी दुनियाँ में खो गये, तभी रिक्शे वाले भैया ने टोकते हुए कहा- अरे बेटा हमाये पैसे दे दो हमको और भी सवारी लेनी है. अचानक से दोनों फिर इसी दुनियाँ में वापिस आ गये. अनामिका दो कदम पीछे हट गयी और मुंह फेर कर दो पल पहले हुए वाकये पर मुस्कराने लगी. रित ने अपने वॉलेट से सौ का नोट निकाला और बाकी बीस को टटोलने लगा वॉलेट की दूसरी जेब में. जेब में १०-१० के दो सिक्के मिल गये और किराया पूरा हो गया १२० रूपये. रित ने हाथ बढाया ही था कि अन्नू(कभी कभी दोनों एक दूसरे को ऊटपटांग नामों से बुलाते हैं लेकिन दुनियाँ के सामने ऐसे नाम लेने से बचते हैं) ने रित का हाथ पकड़ लिया और बोली- रुक! रुक! मेरे पास है चेंज. रिक्शा वाले भैया और रित दोनों जोर से हंस पड़े और एक साथ बोले- ये भी तो चेंज ही है. अन्नू को दोनों का मजाक रत्ती भर भी पसंद नहीं आया और झट से बीस का कागज का नोट रित को थमाया और १०-१० के सिक्के वापस रख दिए रित के वॉलेट में. रिक्शे वाले भैया अपना भाडा लेके आगे बढ़ गये.
दो मिनट दोनों कुछ नहीं बोले, फिर रित ने चुप्पी तोड़ते हुए अन्नू से पूछ ही लिया- तुमको १०-१० के सिक्के इतने अच्छे लगते हैं? अन्नू ने जवाब में कुछ नहीं कहा. लेकिन उसकी हल्की सी मुस्कान और बच्चे की सी आँखों की चमक देख कर जवाब की जरूरत नहीं रही. रित ने दोनों सिक्के इठलाती अन्नू की हथेली पर रख दिए और मुट्ठी बंद कर दी. दोनों एक दूसरे को देख कर जोर से हंसने लगे. बरसों बीत गये इस दस के किस्से को. रित की नज़र अब इन १०-१० के सिक्कों पर रहती है, इनको इकट्ठा करने में उसे बड़ा मज़ा आता है. और आये भी क्यूँ न, ये एक १० का सिक्का करोड़ों की मुस्कान जो ले आता है अनामिका के चेहरे पर.

Life

Life
is like this prose,
irregular and uncertain.
Sometimes
full-stops, colon
semicolon and commas
are needed to make
sense and sometimes
none of them is needed
because few of the things
don't need any stops,
they just need to be
continuous and unstoppable.
Love is one of those things
which is continuous
and unstoppable.
It needs no comma,
no colon no full-stops
to make sense.
It starts with itself
and ends with itself.

We are impossible

He: You are impossible.
She: No, you are impossible. 
He: Yeah I am impossible but you are more impossible. 
She: Whatever. 
He: By the way two impossibles makes a possible, no? remember double negatives rule, two negatives makes a positive.
She:  
He: 

Thursday, November 13, 2014

ख़ुशी

सुबह-सुबह तुम्हारी नन्ही सी आँखें
और चेहरे पर घूमती स्वच्छंद लटें,
भाती हैं दिल को बहुत,
एक टक देखने को मन करता है बस.

रेलवे स्टेशन पर,
अपनी गाडी का इंतज़ार करते हुए,
सहज ही क्षण भर में सो जाना
कंधे से टिक कर मासूम परी सा,
भाता है दिल को बहुत.

दिल करता है गाडी बस लेट होती रहे,
और ये कंधा बस यूँ ही सजा रहे
धीमे से खिसकते तुम्हारे सर से और
वक़्त थम जाये सदियों के लिए. 

सड़क पार करते सहज ही
एक उंगली पकड़ लेना और
हर बार मासूम बच्चे सा बिचक जाना,
लुभाता है इस दिल को बहुत.

चलते चलते थक कर रुक जाना और
फिर कहीं भी इठला कर बैठ जाना,
लगाता है चार चाँद तुम्हारी सादगी में.

दोस्त तुम ऐसे ही स्वच्छंद और खुश रहना
हमेशा बच्चे की तरह,
क्यूँ कि तुम 
ख़ुशी का दूसरा नाम हो मेरे इस दिल के लिए.

Saturday, November 8, 2014

I might puke on your face

Don't shove your ideals of sacredness down my throat,
Because it feels stinky and bitter and
I might puke on your face.

Don't shove your ideals of your supremacy down my throat,
Because it feels heavy and rough and
I might puke on your face.

Don't shove your ideals of your nobility down my throat,
Because it feels creepy and itching and
I might puke on your face.

Don't shove your ideals of your godliness down my throat,
Because it feels dusty and useless and 
I might puke on your face.

Don't shove your ideals of your dual face down my throat,
Because it feels hallucinating and high and 
I might puke on your face.

Don't shove your ideals of your selective cleanliness down my throat,
Because it feels sticky and disgusting and
I might puke on your face.

Wednesday, November 5, 2014

दोस्ती टूट ना जाये

शायद तब काफी छोटे थे हम,
या शायद दुनिया की चातुकता से अनजान.
वो दिन जब एक दूसरे को चिढाने में
घंटों निकल जाया करते थे.

रात उन लव स्टोरियों की बातों में बीत जाती थीं
जो शुरू होने से पहले ही दफ़न हो जाती थीं.

खूनी-रिश्तों से मीलों दूर बस तुम्हारा ही साथ था,
चाहे चिलचिलाती धूप में बे-मन रेमेडिअल जाना हो,
या फिर रिमझिम बारिश में गैलरी में मोर्निंग असेंबली के लिए इकठ्ठा होना.

एक दौर आ गया था जब छुट्टियाँ अच्छी नहीं लगती थीं,
क्यूँ कि छुट्टी के दिन हम साथ नहीं होते थे, दूर होते थे.
गर्मी में रात को सड़क पर सोना और तारे ताकना,
एक दूसरे की खिल्ली उड़ाना बिना किसी बात के,
बस साथ तुम्हारा ही था, बातों में, नज़रों में, और दुआओं में.

कब बड़े हो गये पता ही नही चला, देखते ही देखते
एक नादान बच्चे से दाड़ी मूंछ वाले आदमी बन गये.
बिछड़ते गये एक के बाद एक साथी.

जिंदगी में किसी के जाने पर रोना नहीं आया था तब तक,
लेकिन बारहवीं का वो आखिरी दिन कल सा लगता है,
आँखें बस सारे दिन नम थीं, गला रुंदा था, दिल में दर्द सा था,
डर था उस खुबसूरत सी दुनिया से निकलने का,
डर था पता नहीं अब कभी तुमसे कभी मुलाकात भी होगी कि नहीं,
डर था दुनिया की इस भीड़ में तुम कभी दिखोगे कि नहीं.

इस छोटी सी ज़िन्दगी के वो बड़े प्यारे पल थे,
जिनको जी लेने का मन बार बार करता है, हर दिन, पर शाम.

यूँ तो न भरोसा है खुदा में, न ही किसी पुनर्जन्म में,
लेकिन किसी बदले वो दिन फिर जीने मिलें तो हज़ार बार जी लूँ.

आज फिर ये शाम याद दिला रही है उन बातों की, उन लम्हों की,
जो दूर होते हुए भी तुम्हारे साथ जिए थे,
गला फिर से रुंद गया है बारहवीं के आखिरी दिन सा,
आँखों का पानी बाहर निकलने को आतुर है.

आज भी तुमको खोने का डर जिन्दा है,
डर है कि ये नाजुक सा रिश्ता टूट ना जाये,
दुनिया की इन तंग गलियों में तुम ओझल ना हो जाओ,
डर है कि मैं टूट ना जाऊँ टुकड़ों में.

~शुक्रिया दोस्त