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Thursday, November 13, 2014

ख़ुशी

सुबह-सुबह तुम्हारी नन्ही सी आँखें
और चेहरे पर घूमती स्वच्छंद लटें,
भाती हैं दिल को बहुत,
एक टक देखने को मन करता है बस.

रेलवे स्टेशन पर,
अपनी गाडी का इंतज़ार करते हुए,
सहज ही क्षण भर में सो जाना
कंधे से टिक कर मासूम परी सा,
भाता है दिल को बहुत.

दिल करता है गाडी बस लेट होती रहे,
और ये कंधा बस यूँ ही सजा रहे
धीमे से खिसकते तुम्हारे सर से और
वक़्त थम जाये सदियों के लिए. 

सड़क पार करते सहज ही
एक उंगली पकड़ लेना और
हर बार मासूम बच्चे सा बिचक जाना,
लुभाता है इस दिल को बहुत.

चलते चलते थक कर रुक जाना और
फिर कहीं भी इठला कर बैठ जाना,
लगाता है चार चाँद तुम्हारी सादगी में.

दोस्त तुम ऐसे ही स्वच्छंद और खुश रहना
हमेशा बच्चे की तरह,
क्यूँ कि तुम 
ख़ुशी का दूसरा नाम हो मेरे इस दिल के लिए.

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