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Wednesday, November 5, 2014

दोस्ती टूट ना जाये

शायद तब काफी छोटे थे हम,
या शायद दुनिया की चातुकता से अनजान.
वो दिन जब एक दूसरे को चिढाने में
घंटों निकल जाया करते थे.

रात उन लव स्टोरियों की बातों में बीत जाती थीं
जो शुरू होने से पहले ही दफ़न हो जाती थीं.

खूनी-रिश्तों से मीलों दूर बस तुम्हारा ही साथ था,
चाहे चिलचिलाती धूप में बे-मन रेमेडिअल जाना हो,
या फिर रिमझिम बारिश में गैलरी में मोर्निंग असेंबली के लिए इकठ्ठा होना.

एक दौर आ गया था जब छुट्टियाँ अच्छी नहीं लगती थीं,
क्यूँ कि छुट्टी के दिन हम साथ नहीं होते थे, दूर होते थे.
गर्मी में रात को सड़क पर सोना और तारे ताकना,
एक दूसरे की खिल्ली उड़ाना बिना किसी बात के,
बस साथ तुम्हारा ही था, बातों में, नज़रों में, और दुआओं में.

कब बड़े हो गये पता ही नही चला, देखते ही देखते
एक नादान बच्चे से दाड़ी मूंछ वाले आदमी बन गये.
बिछड़ते गये एक के बाद एक साथी.

जिंदगी में किसी के जाने पर रोना नहीं आया था तब तक,
लेकिन बारहवीं का वो आखिरी दिन कल सा लगता है,
आँखें बस सारे दिन नम थीं, गला रुंदा था, दिल में दर्द सा था,
डर था उस खुबसूरत सी दुनिया से निकलने का,
डर था पता नहीं अब कभी तुमसे कभी मुलाकात भी होगी कि नहीं,
डर था दुनिया की इस भीड़ में तुम कभी दिखोगे कि नहीं.

इस छोटी सी ज़िन्दगी के वो बड़े प्यारे पल थे,
जिनको जी लेने का मन बार बार करता है, हर दिन, पर शाम.

यूँ तो न भरोसा है खुदा में, न ही किसी पुनर्जन्म में,
लेकिन किसी बदले वो दिन फिर जीने मिलें तो हज़ार बार जी लूँ.

आज फिर ये शाम याद दिला रही है उन बातों की, उन लम्हों की,
जो दूर होते हुए भी तुम्हारे साथ जिए थे,
गला फिर से रुंद गया है बारहवीं के आखिरी दिन सा,
आँखों का पानी बाहर निकलने को आतुर है.

आज भी तुमको खोने का डर जिन्दा है,
डर है कि ये नाजुक सा रिश्ता टूट ना जाये,
दुनिया की इन तंग गलियों में तुम ओझल ना हो जाओ,
डर है कि मैं टूट ना जाऊँ टुकड़ों में.

~शुक्रिया दोस्त

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