बात कुछ अरसे पहले की है,
जब वो मिले थे हमें इत्तेफाक से.
उनके लिए ये महज़ मुलाकात ही थी शायद,
पर हमारी तो जैसे बरसों की आरजू पूरी हुई थी.
लगा कि शायद मेहरबान है 'खुदा',
ऐसा हम नहीं हमारे कुछ दोस्त कहते हैं.
उस मुट्ठी से दिल में गुदगुदी हुई,
सोचा "इकतरफा" इज़हार कर ही दूं.
क्या करता, बेचारे दिल ने तो खूब साथ दिया,
पर कमबख्त जुबान ने पलटी न खायी.
बात वो अब तक अनकही सी ही है,
बस लगता है एक पौध से दरख्त हो गयी है.
बात वो कुछ अरसे पहले की है,
जब वो मिले थे इत्तेफाक से .......
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