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Sunday, August 11, 2013

उसका छज्जा और मेरी खिड़की

उसका छज्जा और मेरी खिड़की
पसंदीदा जगह हैं मेरी।
दोनों जहन में हमेशा रहते हैं,
खुद से और मुझसे गुफ्तगू करते हैं।
मेरी खिड़की और उसका छज्जा
कुछ फासले पे तो थे मगर
दोनों एक दूसरे को निगाहें
तिरछी कर देख लेते थे।
सुबह-सुबह खिड़की पर
टकटकी लगा के बैठना
और उसको छज्जे से
बाहर निकलते देखना
और फिर झट से खुद भी
कुछ फासला बनाके अजनबी से
उसके पीछे पीछे चलना,
ये सब मुमकिन था
क्यूँ कि मेरे घर की खिड़की
और उसके घर का छज्जा
आमने सामने थे।
वो दिन थे जब जिंदगी में
घड़ी की जरुरत थी,
क्यूँ कि खिड़की और छज्जा
मुझे सही वक़्त की खबर देते थे।
शाम और देर रात को भी
ये खिड़की और छज्जा
बखूबी मेरा साथ देते थे मेरा,
उसका दीदार कराने में।
रात चाँदनी हो या फिर काली
मेरा चाँद मुझे दिखता ही था,
इसी जमीन पर, कुछ फासले पर।
आज मेरी खिड़की है
उसका वो छोटा सा छज्जा,
बस बाकी हैं तो दोनों की यादें,
जो वक़्त पाते मेरे ख्वाबों को
खुबसूरत और दिलनशीं बनाती हैं।
कभी जायेंगे उसी घरोंदे में देखने
कि क्या मंज़र आज भी वही है,
कि मेरी खिड़की और उसका छज्जा
आज भी आपस में बातें करते हैं।

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