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Friday, October 10, 2014

पन्ना या ज़िन्दगी

किताबों के पन्नों को पलटते हुए बीच में दिख जाते हैं
वो पल जो बस उनके होने से खूबसूरत होते हैं।
कभी कभी इन पन्नों में लाइनों के बीच का फासला,
लगता है रेल की पटरियों सा जो मिलती नहीं पर साथ हैं,
ये पटरियां जो एक दूसरे के बोझ को खूब समझती हैं,
इसलिए साथ चलती हैं कंधे से कंधा मिलाके।
लफ़्ज़ों के बीच की दूरियाँ उन पत्तियों सी हैं,
जो पेड़ की टहनियों पर लटकी हैं सभी को जगह देते हुए।
ये पन्ना है या है तस्वीर जिंदगी की,
जो पूूरी है किसी के साथ से कुछ फासलों के साथ भी।

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