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Sunday, February 23, 2014

मैं इक हर्फ़ हूँ

मैं इक हर्फ़ हूँ,
जिसको भरे पन्ने में भी लिखना चाहो तो लिख सकते हो.
मैं आइना तो नहीं पर उसका छोटा टुकड़ा जरुर हूँ,
जिसमें अगर कभी झांकोगे तो अपना खुबसूरत चेहरा देखोगे.
या शायद मैं हवा का वो झोंका हूँ जो जाने पर कम,
और आने पर ज्यादा मचलता है.
या मैं कुएं का खुरधरा घाट हूँ जो समय पाते
शायद पनिहारे की उलझन थोडा कम करता है.
या फिर मैं शायद अंधकार हूँ जो धीरे धीरे
सुबह के आने पर अपने ही आप छट जाता है.
या फिर शायद मैं हर्फ़ ही भला हूँ,
जिसको भरे पन्ने में भी लिखना चाहो तो लिख सकते हो.

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