वो निर्बल अबला झाँक रही ,
घूँघट से अपने ताक रही ।
जब मुडके देखा आदिकाल ,
आदर था जिसमें बेमिशाल ।
पर आज मनुज ने बदल दिया ,
उस नारी को निर्वस्त्र किया ।
जिसने आँचल के छाँव तले,
इस दंभी पुरूष को पला था ।
हे दंभी ! क्रूर ! कृतघन पुरूष !
तू खाले इसपे तनिक तरस ।
वरना वो दिन भी दूर नही ,
जब धरती होगी नारी रहित !
घूँघट से अपने ताक रही ।
जब मुडके देखा आदिकाल ,
आदर था जिसमें बेमिशाल ।
पर आज मनुज ने बदल दिया ,
उस नारी को निर्वस्त्र किया ।
जिसने आँचल के छाँव तले,
इस दंभी पुरूष को पला था ।
हे दंभी ! क्रूर ! कृतघन पुरूष !
तू खाले इसपे तनिक तरस ।
वरना वो दिन भी दूर नही ,
जब धरती होगी नारी रहित !
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