ना जाने कब, कहाँ, कैसे,
डूब गया मैं आपकी इन झील सी आँखों की अथाह गहराई में.
खो गया "मैं" का अस्तित्व यहाँ ,
और मिली "हम" की नई काया.
कई बार "मैं" ने बहार निकलने का प्रयास भी किया,
किन्तु व्यर्थ ही रहे उसके कोटि प्रयास.
या यूँ कहो कि "मैं" को हराकर "हम" जीत गए ,
स्वयं को खोकर "हम" को पा लिया.
लगता था मानो सदियों से सूखी पड़ी जमीन को,
बारिश की नन्हीं बूंदों ने ओत प्रोत कर संतृप्त किया हो.
इसी संतृप्ति की चाह आज भी बरक़रार है ,
"मैं" फिर आज उसी गहराई मैं खो जाना चाहता हूँ!
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