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Wednesday, December 10, 2014

यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं

वो किताब के पीछे से आखिरी बेंच पर बैठ, 
उनको अपनी लटों से खेलते देखना,
वो पानी पीने के बहाने क्लास से निकल कर
चोरी से उनको एक नज़र भर देखना,
वो दूर बैठ उनकी हर हलचल में डूबना, 
वो छुट्टी के दिन सूना सूना महसूस करना, 
वो रफ के पन्ने पर उनका लिखा जुमला देख
बार बार देख ख़ुशी से पागल होना,
वो क्लास रजिस्टर में चालाकी से
उनका जन्मदिन पता कर लेना,
(हाँ वो बात अलग है कि फिर भी,
विश करने की हिम्मत ना कर पाना)
वो उनकी एक झलक के लिए झरोंखे से,
एक टक देखना और सपने देखना,
वो सब अभी भी नया सा लगता है,
यकीन मानो यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं,
और ना ही हमको बूढ़ा होने का एहसास होने देतीं,
वो तो एहसासों को हमेशा तारो ताज़ा रखती हैं,
और कभी रास्ते में बचपन का साथी मिलने पर, 
बीते दिनों को फिर से जिंदा कर देतीं हैं. 
यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं...

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